Thursday, 31 May 2012

अकेले नहीं उडेंगे अब ....

ख्याल रख ..अकेले नहीं उडेंगे अब..
साथ ही जाना है अब दरकार ए मौत भी हों तो अच्छा ..
क्या जन्मों में भरोसा है ..
सुना है आत्मा की आवाज जाती है जब उस छोर तब पुन:जन्म लेते है ..
सोचा है पंहुचा ही दूँ ...इन्तजार कैसा ..फिर सोच ..
फलक के उस छोर पर भी शब्द नहीं ढूढने होंगे ..
बदलों के पार ....क्या नजर होगा
उड़ते से हम ढूंढ लेंगे फिर एक दूजे को वहाँ भी ..
रूह का रुह के साथ सफर ..ये कौन सी दुनिया है ..
कोई कैसे बताएगा ...किसी ने विचरण न किया होगा ऐसे..
स्मित रेख को मिलने दो खुद से ..
इतना जोर से भी नहीं, आवाज आ रही है हंसी की बाहर तक ...
ओह ...तुम हंसते भी हों ...शब्द ..सूरज को तो अलग ही पाया है सबसे ..
आज तबस्सुम सजा ही डालो ..
चल अब उड़ चले ...दाना भी बीनना है सहर का सूरज सर पर चढ़ आया है ..
तापमान कुछ ज्यादा चढा है आज मगर खामोश....
बहुत बोल चुके न ..अब यूँ न देखो ..
नहीं ....बिलकुल भी नहीं ...मालूम है ...
एक दिन के बंद ने सब कम ठप्प के दिए है ..विजयलक्ष्मी


नवजिशें जिसके लिए हैं ....





                                       नवाजिशे जिनके लिए है उन्ही के दिल से पूछना ..

                                       खुशबू भरे वो हाथ .....दामन किसका पकड़े है आज भी .
                                       खो जाती है रात जागकर क्यूँ तन्हा तन्हा कुमुदनी सी 
                                       क्यूँ सवाल फकत चले, किसके ख्वाब दामन पकड़े है आज भी .
                                                                                              विजयलक्ष्मी .

एक दिन का बंद ...



एक दिन का बंद देश की करोडो का घाटा है 
घटना मानते है तो एक दिन पीछे राष्ट्र रह जाता है 
एक दिन का उत्पादन बस वक्त यूँही खाता है ..
व्यापर एक दिन का करोडो का चुना लगाता है ...
बैंक का ब्याज और मूलधन एक दिन का मारा जाता है ..
धन करता कमाल तभी जब चलता रहे ..
एक दिन खातिर विकास मर जाता है ...
काम के साथ विरोध करना चाहिए ...
सबको काली पट्टी जरूर लगाना चाहिए ...
सडको पर चक्का जम हमरे देश का हाल बुरा समझो ..
और बंद करने वालो की नियत बुरी हों न हों .
राष्ट्र की तकदीर बुरी हों जाती है ....
हमारी जिंदगियां एक दिन से पिछड़ जाती है
एक दिन के सूरज को बंद को कह्देती हूँ
फिर क्या होगी हालत देखलो ... सोचलो .................
..त्राहिमम त्राहिमाम .!!--विजयलक्ष्मी 




जुगनू सा अहसास


जुगनू सा अहसास टिमटिमा रहा है आज भी ..
वो तस्वीर जिसका तसव्वुर हम कितनी बार करते है ..
शायद भूलते ही नहीं पलभर को भी ..
नींदों की ख्वाहिश अब कहीं  से तो  लानी होगी ...गुजारिश करेंगें  ..
परवरदिगार से कहा था ..सताना मत... पर सुनने को राजी नहीं लगता  ..
धुंधली  सी क्यूँ हों रही है .....धुआँ धुँआ  है सब कुछ ,,और 
मौन की  भाषा को चीरती ये आवाज आज...मुझे बहा रही है ....सन्नाटा बोला है ..
शब्दों में सुनी आवाज कानों में सुनाई दी और....
 उतर गयी भीतर गहरे जैसे कुएं में या 
ये वक्त रंग क्यूँ रहा है  ...आज बोल ..नया सा है सब ..हाँ सब कुछ ..
नहीं मालूम दर्द चल दिया .....जानिब किसकी ...
जलकण मेरे दामन से लिपटे है हमेशा के लिए हिफाजत से 
चैन शायद ही आयेगा बेगाना हुआ  जाता है .. वक्त गुजरता है.
शिकायत कैसी है ये ...सब साथ ही है चल पड़े है कदम ...देख ले 
मेरी अमानत रहने दे वही महकने दे .. .गुलों को और बिखरने दे अब अहसास को 
निकहत  ए गुल ..अपना रंग जमा ही गयी और गुमशुदा हम गिने गए 
तलाश  पूरी कर वर्ना मौत दे दे ..--विजयलक्ष्मी

भीगे नम नयन तेरे

भीगे नम नयन तेरे ..
क्यूँ इतनी आतुरता है ..
माना मन जलता है ..
मैं मौन ...स्वीकार रही ...
निमंत्रण प्रेयस ..
तुम अधीर कितने क्यूँ ?
तुम ही हों मेरे और मैं ...मौन ..?
चाँदनी रात बैरं है मेरी ..
बोल कैसे स्वीकार करूं मैं ...?
आती हूँ पलकों में सजाकर ..
ख्वाब तुम्हारा मौन ...
अंगीकार हैं सब रंग अब प्रेयस ..
.....स्वीकार है .....प्रणय...
अंतस उजास भर अब ..
और सुन मुझे भीतर अपने ..
तुम ही हों ..और मैं मौन .....|

Wednesday, 30 May 2012

पूजे है ख्वाब भी उसके हमने



                               


                                     ए सफर चल अब चल दिए बता क्या सोचना ..

                                     जिंदगी दांव पर लगी है जुआरी की तरह अपनी ..
                                     मदिर का देवता नाराज सा क्यूँ है कहे तो सही ..
                                     पूजे है ख्वाब भी उसके हमने पूजा की तरह अपनी ..--विजयलक्ष्मी
 

Tuesday, 29 May 2012

क्या पूछते हों मेरी कहानी ..


क्या पूछते हों मेरी कहानी ..
ख्वाबों की दुनिया की युवरानी ..
हकीकत मगर कुछ बदल सी गयी है ..
तस्वीर नंगे पांव चल रही है
न तन पे है कपड़े ढक ले जो सारा ..
वहशी दरिंदे पढे रोज सारा ..
लालसा वासना की नजरों में है बस्ती बनी उनकी ..
पक्के मकां और हथिया भी है ..
भूखे मगर संग होशियार भी ..
नोंचते है नजर से ही लहुलुहान कर दें
मौका मिले तो ईमान हर दें
मिला ही क्या खारों से अलग कुछ..
नम है जमीं इन्तजार बसाया है ..
दर को मेरे क्यूँ खटखटा कर आया
हाँ इन्तजार रहता है जाने क्यूँ अब ..
नग्न पाँव हम चल ही दिये है संग तुम्हारे
कानून किसका हुआ अंकशायिनी बन ..
दरोगा बिका ..उधेड़ डाली उसने दुनिया ..
बता किसका अब मैं एतबार करलूं ..?
खोजती नजर है देह को मेरी ..
आत्मा का बता कैसे इलाज करलूं
आवाज मेरी सुनाई जो दे तो कौन से एहसास बाकी मैं भर लूं ..
तप्त हूँ संतप्त हूँ ...मौन तेरा समाया है मुझमे ..
सन्नाटा बिखरने लगा है अब मेरे पास ..
शब्द बोने है जो बोलते हों ..
गर सुन सको..... तो तुम बताना
एक इलाज अब मेरी समझ है आया है ....
कानून को बस अपना बना लूं हथियार अब हाथों में उठा लूं..
तलवार कटार पुराने हए है ..हाथों में अपने शोले उगा लूं ..
और ...उतार दूँ घाट मौत के जिन्होने श्मशान तन को बना डाला
कर दूँ इहलीला ही समाप्त ...न होगा बांस न फिर बांसुरी ही बजेगी
किसी को लड़की की चिंता न रहेगी ...
रखवाले जब भक्षक बनेगें यही रूप अब हमको धरने पडेंगे
बोल अब कुछ तो बोल ...
या मैं ही गलत हूँ ....शायद ...?? --विजयलक्ष्मी
 

किसी की दुनिया का

हम शमा तो बने मगर रोशन न हों सके ..
बन गए दाग ए दिल, किसी की दुनिया का .

वो देखकर आज भी मायूस ही आते हैं नजर
है बिछड़े हुए साहिल, किसी की दुनिया का .

मैं वो निशाँ हूँ, मिटा नहीं गुजरने के बाद भी..
टूटा सा छान, बिखरा लहू ,किसी की दुनिया का.

कैसे करें मुरव्वत जहाँ की , किनारा न मिला ..
डूबा सितारा  सागर में, किसी की दुनिया का .

राहें बंद हैं , मंजिल तन्हा ,क्यूँ उदास है खड़ी..
बर्बादियों के साये न उजाड़े रंग , किसी की दुनिया का .--विजयलक्ष्मी  

अदा उनकी !

जानकर भी अनजान बनना ,
   देखकर फिर फेर लेना नजरें ,
     अजब ठहरी, सरेआम कत्ल करने की अदा उनकी !

जुनून ए वफा आँखों में दिखता है ,
   अँधेरे में भी आहट सांसों कि जानते हैं,
       उफ़,दिन के उजाले में बेवफा दिखने की अदा उनकी !

 जाने क्यूँ दिल नफरत भी नहीं करता ,
    नाराजगी कैसी उल्फत की राह में,
        है गजब ,नजरों से वादा, लब न खोलने की अदा उनकी !

कहते हैं हर एक बात नजरों से अपनी ,
     खुशियों को दामन में डाल मेरे ,
         ओह ,गमों को भीतर ही खुद में समेटने की अदा उनकी !

अहसास क्यूँकर छिपकर जीते है जिंदगानी ,
     पीकर घूंट गम के दिखाते हैं रवानी ,
          आह ,जलाकर खुद को खुद में दफनाने की अदा उनकी !
                                                                     --विजयलक्ष्मी 

Monday, 28 May 2012

खुदाई का भरम भी रखना होगा ...

खुदा !!खुदाई का भ्रम भी रखना होगा..
लोग फिर बेगैरत कहने लगेंगे वर्ना ...

कत्ल हुआ तो लहू भी बहेगा लाजिमी..
दिखावा है मौत भी कहने लगेंगे वर्ना ..

कसाई के दर पे दरकार जिंदगी की बता ..
धंधे के बने दलाल कहने लगेंगे वर्ना ..

सहमा क्यूँ सूरज ,तेल उडेलकर मौत का..
गुजरिशें भी रंग बदलने लगेगीं वर्ना ..

बियाबाँ शहर है.. बुत भी अजीब है सारे..
कातिल को खुदा ?फलक हंसेगा वर्ना ..-विजयलक्ष्मी



बिखर जाने देते हमे ,आदत है सिमटने की फिर फिर
या खुदा !कैसे सम्भालेंगे अब इस गुनाह को अपने ..
                                                       विजयलक्ष्मी







वो बिखरा है इस कदर कि सहना मुश्किल है अमीत
जमी निगल ले मुझको, ए खुदा !मिटा दे राह ए पनाह अपने ..
                                                                 विजयलक्ष्मी .

जिंदगी जितना जाना है तुमको ...

जिंदगी जितना जाना है तुमको ..
तू कयामत सी नजर आती है ..

जिन्दा रखती है इतना मुझको 
फिर अश्कों में उतर आती है ..

अता कर दूँ शुक्राना तुम्हारा 
मौत से पहले ही संवार जाती है ..

तुम न होती तो बुत दिखते यहाँ 
तुमसे हर जगह बहार आती है ..

शक्ल ओ सूरत की तामीर कैसे हों
तू हर पल नया रूप नजर आती है ..

तल्ख चेहरा भी देखा कई बार
खिलौना सी मौत को डराती नजर आती है .--विजयलक्ष्मी

कुछ भी नहीं है प्यार ..
और प्यार ही खुदा है ..
महक एक जुदा सी ..
जिंदगी भी फना है ..
एक अहसास है किसी के होने का मुझमें..
मेरा ही है अपना.. और मेरा ही नहीं है..
मुझमे बसा है लहू सा और दिखता भी नहीं है ..
हूँ खुद से बेखबर ,क्यूँ कोई खबर नहीं है ..
बेतरतीब जिंदगी की अजीम तहजीब सा वो कहाँ कहाँ नहीं है ..
तन्हा हूँ खुद से गाफिल ,और तन्हा भी नहीं हूँ ..
खोई है मेरी दुनिया और शामिल मैं उसमे शामिल भी नहीं हूँ ..
एक अदा है ,एक अदावत है ..
एक खुशी ,एक गम ,जिंदगी का किस्सा ,बातों का मेरी हिस्सा ..
मेरी यादों का सरमाया ...
जिस बिन न कुछ भी पाया ...जुदा हों कर
क्यूँ कुछ है पाने की चाह लुटाने बाद भी सारी दुनिया ..
गली मुहल्ला सारे सरहद बन गए थे ...
हम नजरों में उनकी शहंशाह बन गए थे ..
औकात सबको मालूम ...किसकी बताए मुख से ..
ये प्यार है अजूबा कैसे भला बताएं
हाँ कैसे भला बताएं.--.... 


                                                         विजयलक्ष्मी

तो गजल बनती है ..

पिघलते है पत्थर मोम की तरह तो गजल बनती है
 ..
जिंदगी झुलसती है दग्ध सूरज की रौशनी में, तो गजल बनती है
                                                              विजयलक्ष्मी 




Sunday, 27 May 2012

....खामोशी को खामोश ही रहने दे ....




                    इस खामोशी को ख़ामोश ही रहने दे ....

       
               उज्र ए सिला मौत की सी तासीर न छुपाये बैठा हों कहीं .

                                                                  -- विजयलक्ष्मी 

कुछ अहसासों को गर कविता मानों तो कहदो कविता है .


कुछ अहसासों को गर कविता मानों तो कहदो कविता है ...
खरोंचे सी है कुछ , दर्द ए तसव्वुर की शायद ..
कभी भरेंगी नहीं ,समन्दर को छूना मना है हमें .!
चित्कारती सी आवाज पुकारती भी है ....
प्रश्न सा छूकर कह जाती है रुके रहना यहीं .
अंतस को बरसने भी नहीं देता ...थमा सा एक अहसास ,
घनीभूत पीड़ा सी एक ,साथ क्यूँ ?
हदों की बंदिशे तो खत्म होनी थी .कुछ हदें बढ़ गयी हैं आजकल ...
आसमां खुला होकर भी स्याह सा नजर आया है ...
सहर की लालिमा ने अजब सा श्र्गार कर मौत के साथ दावत का मंजर सा सजय है ..
..कातिल मेरे ही कत्ल को भी छुरी मुझसे ही मांगता है ..
आंसूं क्यूँ बहाऊँ...शहादत बाकी है सांसों की संसद के दरवाजे पर ...
लोक सत्ता मुह चिढा रही है और पिचकारियाँ लेकर कुछ बौछार शरू हों ही गयी आखिर .....
आज के मौसम का तापमान खामोश है मनन की खातिर ..
अब टपके का डर सिंह से ज्यादा सताता सा लगने लगा है ...?
सूखे से खेत मुहँबाए आसमां को निहारते है बूँद तो बरसे ...
कुएं खोदने वाले तो सूखे में नदी की लकीरें खिंच कर ताली बजा रहे है ..
कुछ सहर के सुरज के साथ छेड़छाड़ के मूड में लगे दिखाई दे रहे है ...
दूध की नदियाँ पानी को भी त्राहिमाम त्राहिमाम करती दिखाई दे रही है ..
अखबार की खबरे हर आंख में दूर तक पढ़ी जा रही है मगर..
 चुप्पी मौत सी पसर जाती है ...
कुछ को खिडकी से मुहँ छिपा के कच्छप सी आदत है...
 शक्ल ओ सूरत दिखा शिखंडी की तेरे पीछे छिप जाने की ..
जंगली फूलों को महलों के तरीके लुभाते तो है जिंदगी गिरवी पड़ी है दिखाई दे रहा है कोशिश तो कर ही लूं शायद....टोटके लगने लगे है ...
सत्ता छोड़ कर रानियाँ महल के बाहर कैसे आ रही है ...
सूरज सहमा सहमा सा क्यूँ है आजकल ...
आवाज की बुलंदी कहीं भीतर से रही है कुआँ जैसे कोई कब्जा लिया हों ..
फिर चल पड़े न तुम मेरे साथ खेलने खेल..
 रुको जाओ बस वक्त भी चल दिया ...
शब्द तुम ...भी चलो अभी ..मिलूंगी तुमसे भी ...भेंटना है ..
.कल तुम दिखे नहीं ..या ओझल हुए क्यूँ बताओ ?
जान लो खिडकी खुली थी... अंतस का उजाला मुहँ फेर कर निकल गया ...
और इन्तजार ..इन्तजार ..बस फिर इन्तजार ....?--विजयलक्ष्मी
 

Saturday, 26 May 2012

मन डोलत रही पर बोले नहीं .


अजान रहे पर अजान नहीं ..


अज्ञानी बने पर अज्ञानी नहीं

जो कभी उपजी मन में ,चुप 

समझे मन की कही अनकही .

 मुड देखूं कभी जो गलियन में

 कोई और नहीं ,कोई और नहीं .

 बस बोले नहीं मुख खोले नहीं ..

 राह मिली क्यूँ उस राह से ऐसे

 मन डोलत रही पर बोले नहीं ..--विजयलक्ष्मी .

Friday, 25 May 2012

आम आदमीके लिए ही ....

सबकुछ आम आदमी के लिए ही क्यूँ ....
आज एक दिन की बात नहीं ...
संसद की कैंटीन में खाना सस्ता ...
और बाजार में इतना महंगा क्यूँ ?...
आम इंसान को मात्र बत्तीस रूपये में 
अमीर घोषित कर दिया है तो पेट्रोल की कीमत इतनी महंगी क्यूँ ....
.जब आम जनता के लिए लाभ् की कोई बात होती है तो संसद में झगड़े और....
सांसदों के लाभ की बात पर चुप्पी क्यूँ ?......
हर बार आम इंसान ही पिसता है ....
व्यापारी वर्ग झूठ की तराजू पर बैठ कर टैक्स बचाता है और
सरकारी व्यक्ति काम के बाद भी पूरा टैक्स दे क्यूँ .....?
कितने है जिनके टैक्स की भरपाई वक्त पर होती है ..
कितने है जो चोरी की बिजली जलाते है और सरकार चुप क्यूँ ...
ये तो और एक पत्थर है जो सरकार मार रही है आम इंसान के सर में ...
संसद हमारी जेब के पैसे से चलती है ..
वहाँ काम होता नहीं क्यूँ ...?
कभी झगड़े कभी जूतमपैजार ...
कभी बाहर निकल कर आम आदमी के पैसे की बर्बादी क्यूँ ..?
काम अपने कार्य क्षेत्र में न करके दिल्ली में सब बैठे है क्यूँ ..?
सरकारी गेस्ट हॉउस को जरूरतमंदों को नहीं मिलते ...
उन्हें भी ये नेता घेर कर बैठे है क्यूँ ..
कोई एक बात हों तो गिना दूँ ...
मेरे देश की कीमत लगा बैठे है क्यूँ ..?---विजयलक्ष्मी



कशमकश या हक ....?

आज मेरी मौत हुई ..कई मायनों में ...
खनक और चबक दोनों साथ थी शाम तक ...
आज रात नहीं मालूम क्यूँ इतना अँधेरा हुआ..है बाहर से भीतर तक ...
मालूम है वहाँ एक दीप जल रहा है आस का ,मगर मन गमगीन हो गया ..
उल्लास खो सा गया है मन का ...और में न चाहते हुए मरने को तैयार हूँ ..
उसने मुझे मार डाला ...या मैंने ही मौत को चुन लिया ...
क्यूँ इतनी शिद्दत भी नहीं आज ..शब्दों में ...
खुद को ढूंढ सके ....ये कोई आयाम
 नहींहै ...
फलक के एक छोर की माफिक हूँ ...अबूझ सी पहेली मैं ...
इतनी बैचैनी .....मुझे मार डालना चाहती है ...
मगर मौत को अभी इन्तजार करना ही होगा ...
मेरे खंजर को संवरना ही होगा ..
मुझे जन्म लेकर भी उस राह को पाना ही है ...
दोस्ती और दुश्मनी से अलग मुकाम तय करना ही है ...
आज की खामोशी मुझे साल रही है ....
दुआ है खामोश मन के भीतर की ......
कोई रास्ता तो होना चहिये ...सहर को आना ही होगा ...
मगर कब ..?सवाल है बहुत बड़ा ...
वजूद ...मतलब पूछ रहाहै....सबब चाहता है ...
जिंदगी की उड़ान देकर....मुह फेर कर हंसता है मुझपर ...
चैन छीनकर गर्दभ टोली का अपमान चुकाना चाहता है ...
खुद शेर होगा ...मगर सपेरों से बीन बजाते है बिना सुर की ...
और दौड कर डराने को व्यर्थ कोशिश ....जिंदगी बन कर धोखा ....
और अब मौत ....अब मुझे मौत को भी गुलाम बनाना है ..
कम से कम उसे मालूम हों तू ही बसर है और तू बसर भी नहीं ...
जिंदगी भी नहीं और उससे कमरत भी नहीं ...
मासूम सी दुआ बन जा ....
वो साथ देकर अब कतराने लगा है ...

या जिंदगी से पीछा छुड़ाने लगा है ...
जाना है ...चला जा ...आबाद रह ..बर्बादियों को सम्भालेगे ...हम ...
बोल या मत बोल साथ तो चलना ही होगा हमे लेकर ...
दुल्हन सा सजकर अब हम छूटेंगे नहीं... ये हक है हमारा ...--विजयलक्ष्मी 

मन बावरा हों गया.....






मन बावरा हों गया सांवरे तेरे नाम से ...
रतियन नीर बहाऊँ पर तोरे दरस न पाऊँ ..
चैन मिले नहीं मन को मेरे, नाम तेरा ही गाऊँ
चैन जो खोया मिलता मुझको तेरे नाम से ...
मन बावरा हों गया सांवरे ..........

तुम संग सजना प्रीत घनेरी खुद को भूल गयी
प्रेम की पाती तोरे नाम की सखियाँ देख गयी
का मैं करूं सखी देवे है ताने तेरे नाम से ...
मन बावरा हों गया सांवरे ......

तडपन दिल की लिख दी साजन सब तेरे नाम
नाम रटन के सिवा मुझे और नहीं कोई काम
रोम रोम में तुम ही तुम हों ,कैसे जुदा तेरे नाम से
मन बावरा हों गया सांवरे .......

न राधा , न मैं मीरा बस नाम तेरा मैं गाऊँ
मन दर्पण में तेरी सूरत ,तुझको ही रिझाऊँ
और क्या मांगूं , दुनिया मेरी चलती तेरे नाम से ...
मन बावरा हों गया सांवरे .....विजयलक्ष्मी
 

Wednesday, 23 May 2012

नए बीजों की इजाद जमीं की खातिर अपनी ,


नए बीजों की इजाद जमीं की खातिर अपनी ,
नए प्रतिमान तलाशने है ,
उन्ही ख्वाबों के लिए नए रंग तलाशने है..
नए से अन्वेषण ,नए से नाम तलाशने है ..
ढूँढना है शब्दकोशों को नए रंग औ ढंग से,
किसी के बीजों से नए वृक्ष नहीं बनाने हमको ..
नाराज क्यूँ हों किसी चमन का माली ..
गर खुशबू औ रंगत बदलनी मंजूर नहीं तो कोई बात नहीं ...
नए प्रतिमान खोजने होंगे ..


खंगालना है इस दुनिया को नए तरीके से ,नई नजर से ...
सूरज को रश्क हुआ उसका उजाला क्यूँ लिया  ..
रौशनी के पेड़ किरण से नहाये क्यूँ है ...
क्यूँ बदल डाला रंग ओ ताब को इजाजत के बिना ...
श्वेत रंग क्यूं किसी के साथ चले ..
धवल रौशनी को सतरंगी बाना नहीं देना है ..
वक्त बदल जाये मगर पुरातन रंग को सहेजा क्यूँ  ...
कोई नए ढंग से सजाया क्यूँ 
हाँ हुआ है गुनाह ,....गर गुनाह है ..
मिल जाए सजा गर कोई सजा है ..
नए प्रतिमान ढूँढने हैं ...नी ,
कुछ वक्त लगेगा कोई बात नहीं ..
नए बीजों की इजाद  जमीं की खातिर अपफिर रफ्तार पकड़ेगा अपनी सी ...
न अफ़सोस कर ,कोई नई बात कर...
रंज नहीं है कुछ ...आश्चर्य बोध हुआ था थोडा ..
चल चलूँ ,...कुछ वक्त से वक्त की गुजारिश कर लूं ..
नए प्रतिमान बनाने होंगे ..
तलाशने होंगे ..खोजने होगें ...ढूँढने होंगें ...
सजाने होंगें ,गढने होंगे ,रंगने होगें ,करीने से बैठाने होंगें ,..--विजयलक्ष्मी 

मंजूर न हुआ ..


रूह का अहसास खोया सा लगा बाजार में ,
रूह  से जुदा होना मंजूर ही न हुआ ...

हमें गाँव की सोंधी महक रास आती है ज्यादा ,
शहरीकरण यूँ  होना  मंजूर न हुआ ..

खो रहे थे कहीं इंसानी वजूद बिक गए हों जैसे,
दीप को बुझाना यूँ मंजूर  न हुआ ..



 वो ही भले कच्चे मकां महक तो अपनी थी ,
इत्र फुलैलों सी दुनिया मंजूर न हुआ ..

मेरे वतन की महक झाँसी से किस्से किताब ,
ये अल्फाज मंगे हुए से  मंजूर न हुआ ..

बाजारीकरण  भी यहाँ बाजारू सा ही लगता है ,
तहजीब ओ अजीम खोना मंजूर न हुआ ..

कह दो तमाशबीनों से न टुकड़े करे वतन के ,
खंजर का ठिकाना भी बदली  न हुआ ..--विजयलक्ष्मी

मौन साधना ...

मृत्यु  वरण की मौनं साधना ..
भाषा मुखर रूप और सानिध्य आत्म का आत्म से 
परिकल्पना को यथार्थ रूप सी सुनाती सम्वेदना 
सम्प्रेषित हुआ विचार अब दुर्दांत कैसे अहो !
अब विचार शून्यता है कहाँ ..कैसे कहो ..
एक जन्म जीकर जीवट अब जागरण मन का सुना...
झांक अपने भीतर हमने उसी एक आवाज को सुना
जाने क्यूँ प्रस्तर मन बोल उठा धीमे से ....
चल जाग अधर में जीवन की लीला ...
कदम जो बढाये थे ..सखा सम जाकर अब मिला....
क्यों सोच मन में हैं अधूरी ..
क्यूँ अधूरी परिकल्पना ......
कोई नहीं बाकी कहीं अब विलग सा रास्ता ..
म्रत्यु वरण की मौन साधना ...
मुखरित शब्द भेदी वाणी की बोधगम्यता ..
नीरवता मन की और सजल जीवन की परिकल्पना ..
नश्वरता तन की ,रूह की शाश्वत सत्ता का का अभिदान ...
वक्त के साथ वक्त की गुजरिश की अवमानना ..
नब्ज की आराधना ....नैन भर पीड़ा को पी ...अश्रु विरासत बाचना ..
जुडना विभेद करना क्यूँ भला अद्वैत जैसी भावना ...--विजयलक्ष्मी


बदलती जिंदगी क्यूँ ......



बदलती जिंदगी क्यूँ उसी के नाम से अमीत 

दिल तो पत्थर सा हमारा ही हुआ करता है सदा..


जानना चाहता नहीं कोई नादाँ दिल की नादानी
प्यार कहते रहे जिसे हम वो दिल को नहीं पहचानता

गुलों से घर सजाने की खतिर गुलों को ढूंढते कई मिले
वो मगर आया नहीं जिसकी सुनी इस दिल ने सदा

मुह मोड जाना देखा सबने, न देखा दामन खारों भरा
हम बेवफा सही, रवायत ए गुल ए चमन नहीं जानता

रोकते किसको भला हम जब मुड के भी देखा नहीं
वो चल दिया हम देखते ही रहे आज भी हमको सजा .--विजयलक्ष्मी .

बोल दे अब ....

भीगे है जब 
तन मन सखी री 
जल तरंग ..

शहनाई सी
गूंजे है मन में भी
लहराए हैं ..

सावन आके
रिमझिम बरखा
तरसाए है ..

सुन बगीचा ..
खिले प्रसून अब
खुशी गाये है ..

तराने मिल
मंजिल से जिसकी
तुम ही हों ..

लगता है क्यूँ
बूंदों में सब नया ..
रम जाऊँ मैं ..

खो जाऊँ अब
सावन के संग आ
बिजली कौंधी ..

जलतरंग सी
बजी क्यूँ मन में है
बोल दे अब ..विजयलक्ष्मी .

Tuesday, 22 May 2012

ये आँखें .....




                                                     
बरसेंगीं ये आंखे उम्रभर यूँ हीं..

                                                       उसने तो न मिलने की कसम खायी है 

                                                      जख्म गहरे है कितने क्या बताएं हम 
                                                                                                      रवायतों की जंजीरें पहनाई हैं

                                                     चांदनी रात दिल पे असर करती नहीं
                                                       सूरज की तपिश भी नहा के आई है

                                                     जिन्दा हैं कहने को अमीत जिंदगी खोई है
                                                       वो दुनिया के लिए है मुझसे पराई हैं .---विजयलक्ष्मी .

तो मुश्किल क्यूँ है उसका कविता में बोलना


दिल के भावों में शब्दों में तौलना ...
हाथों की चूड़ी का खन खन बोलना 

बहकना हवा सा और पंछी सा चहकना 
महकना गुलों सा भौरों सा मन डोलना 

लोरी का अहसास नींद आँखों में आना 
ममतामयी स्पर्श , गोदी में अखियाँ खोलना
 

देता अहसास बहुरंगी बहनों का बुनना
घड्ना जीवन के लम्हों को,उनका जीवन बोलना ..

वो भी कृति उसी रचयिता की है अमीत
तो मुश्किल क्यूँ है उसका कविता में बोलना ---विजयलक्ष्मी .

नाराजगी ,इस कदर भी ठीक नहीं खुदारा ...

नाराजगी ,इस कदर भी ठीक नहीं खुदारा ...
जिंदगी मौत के पायदान पर खड़ी हों जाये ..

तितलियाँ बरसाने लगे रंग काले पीले ...
आचरण की सभ्यता किनारे पर खड़ी हों जाये ..

सत्य संकेत मर गए थे समाधिस्थ हुए जब ...
अब जिंदगी कारण निवारण पर खड़ी हों जाये ..

चल दिए सफर पर अब जो सोचता हो सोच ले ..
आखिर साँझ अब इन्तजार पर खड़ी हों जाये ..

चलेगा सफर यूँ ही भरोसा नहीं गर अब तलक..
नाखुदा तुम हों ,दर मौत पर कब खड़ी हों जाये..

ले फिर मुबारकें और चले जा ,जो राह पसंद हों ...
बदलना क्यूँ राह गर मंजिल पर खड़ी हों जाये ..--विजयलक्ष्मी

तन्हा कहाँ हूँ मैं ....






तन्हा कहाँ हूँ मैं ,
ये नाचती जलोर्मी ....
मुस्कुराकर बहती हुई पवन 
झूमते लहराते तरु
मंद मंद अहसास देती है
बहला जाने को तत्पर..
गुनगुन भौरों की गुंजार
पंख फैलाये तितली
हवा के झूले पे बैठ
मतवारी पेंग बढा बैठी क्यूँ ,
आज खुशी में नाच रही सी
दिखती है धरती
झूम रहा अम्बर बतला क्यूँ मन मेरे
या बस वहम हुआ दिल को ..
हौले हौले ये अहसास
मीठा सा मिलता क्यूँ है दिल को
जाने क्यूँ मन, मेरा मन.......
लगता है ...लहराता है
बादल उमड घुमड़ गाता है गीत सुरीले
हुआ नव वधु सा श्रृंगार
आज नवबेला महकी हों जैसे ..
मन तरंगित है जाने क्यूँ
उलझा उलझा सा खुद में
कदम उठते नहीं लगते
बहके बहके से लगते है
ये कौन सी रुत है आई 

जैसे कानों में बजती शहनाई ..
और मैं दुल्हन सी खुद को
आज सजा बैठी क्यूँ ...
मेरे नैनो के सपनों में रंगीनियाँ
आज चमक चमक जाती है क्यूँ
क्या सच है प्रीतम के आने अहसास
या कोई ख्वाब है ये
जो मुझको डस लेगा ...
या लौट आई है स्मृतियाँ मन की मेरे
छन से.... फिर आवाज वही
घुंघरूं मेरी पायल के करते हैं झंकार
सुनो ,देखो मत ,कर लो आंखे बंद
मुझे अब लाज आने लगी है ....----------विजयलक्ष्मी 

दहेज के सौदागर .....










दहेज के सौदागरों के घर जाते ही क्यूँ है लोग...
अपनी धनलालसा भी तो दिखाते है लोग ...
लड़की शादी के वक्त दहेज बुरा ही लगता सबको ..
लडको की शादी के वक्त ऊँची दूकान ढूंढवाते है लोग ...
लाते है गृहलक्ष्मी को धनलक्ष्मी बना कर ही ..
मुकरने पर.. फिर आग भी वही जिंदगी में ... लगाते है लोग ...
हर रोज होते है खून कितने सारे ..न जाने क्यूँ फिर भी ...
सम्भलते नहीं है लोग .. दहेज दानव से मुख मोड़ते नहीं है लोग ....
लालची को उसके घर का पता क्यूँ नहीं दिखाते हैं लोग ..
हाथ जोड़ ,उनको छोड़, बिटिया क्यूँ नहीं ब्याहते है लोग
जो जितना कलदार लिए है ,उसके घर वरण को जाते है क्यूँ लोग ..
समाज से निकाल बाहर करते क्यूँ नहीं है लोग ..----विजयलक्ष्मी
 —

क्या मेरा नहीं था ......

क्यूँ चले उस राह पर जिस तरफ जाना नहीं था ...
वो गुलशन क्या मेरा नहीं था ...
क्यूँ बढे थे हाथ जाने किस सफर की तलाश में 
जिन पर मेरा हक नहीं था ...
सिलसिला क्यूँ चला था जिस राह से अनजान थे 
वो पता क्या मेरा नहीं था ...
जिंदगी क्यूँ रुसवा किया इस कदर तुमने हमे ..
क्या तुझे देना साथ नहीं था...
हम टूटकर बिखरे है किस कदर किससे कहे ..
मुख से कुछ कहना नहीं था ...
बदनामी ही पाई है हमने इस राह पर जानते हैं
और जुदा कुछ मिलना नहीं था ..
कतरे कतरे बहेंगे हर राह पर रोकें क्यूँकर भला
हाँ, संवर के शायद बहना नहीं था ....
मेरे चमन की हंसी लौटकर आएगी नहीं कभी ..
मौत ए मंजर मिलना सही था ..
अब सिला साजों से जुदा सन्नाटों का हुआ फकत
साजों खुशी से मिलना नहीं था....
मालूम , साहिल की तलाश नहीं की थी कभी ..
साहिल से तो मिलना यही था ...---विजयलक्ष्मी

............कविता है.



हर रंग कविता कहता है अपने ढंग की ..
किसी को रोने में सुनती ,किसी के हंसने में होती ...
जीवन के रंगों में काली लकीरे भी कविता सी सजती
शब्दों की अन्तरध्वनियाँ* रच जाती हैं एक नई कविता फिर फिर
जीवन के हर रंग में डूबी है कविता ....
अहसासों का मुर्दाघर भी तो कविता कहता है
इन्द्रधनुष सा हर रंग कविता है खुद में ...
ममता का आंचल भी कहता है कविता ,बहन का ख्वाब भाई की कविता ही तो है
खून शिराओं से चल कर दिल तक आता है* सच है ...
बनता है उन्वान तो लिखते है कविता ...
कभी राग रंग कविता लगता है सबको ..
कभी आंसूं की धार लिखे कविता ..
किस लम्हे को कह्दूं कविता नहीं नहीं मेरी ...
जिसको जो रंग लगे प्यारा उसे कविता कहते है..
छू जाये आँखों को मन को बहती अहसासों की नदी को कविता ही कहते हैं ..
तलवार की धार भी कविता है कविता है ,
छोटी सी कटार भी कविता है ...
विषदंत जीवन की अंतिम कविता कहता है ...
करूँण प्रलाप, आहत मन की आहट का आलेख भी कविता है ..
वीराना कविता कहता है खुद में...
गर सुन सको ,....खुद में खुद का होना भी.... कविता है ... --विजयलक्ष्मी

                                               *आभार श्री राजीव चतुर्वेदी जी .

मजदूरी का वादा


स्मृतियों के पदचाप सुनाते है करुण पुकार ..
देते है आवाज संसद अब तो जागो ...
जनपथ के रस्ते होती लूट ...
कुछ इंतजाम करो ....
भ्रटाचार की पोथी को आग लगाने का समान करो ...
आदम की लड़की रंग राग में बेच चुके जो ....
उनका भी अभिमान जरा सा चूर करो ...
मन:पटल के चित्रण की आवाज सुनो ,
रोज रात खाने की खातिर रोती है ...झुग्गी की गुड्डी
मेरे पडोस में बहती नदिया नित नए रूप में गंदी होती ..
घर के कुत्ते भी बिस्किट और मलाई उड़ाते है ..
सफेदपोश रोज नई गाड़ी में मौज मानते हैं...
है कैसा व्यापर अमीर और अमीर हुआ जाता है ...
मेरे घर का एक पेड़ बहुत पानी पीता है,..
गमलों में पुष्पों को सजाते है सब ... और जंगल को ...
और जंगल को ढाक मकोड़े लगा रहे है वो सब...
कविता हंसती है हर ताली के साथ...चलती है साथ साँझ सहर अब ...
बोलो क्या आवाज सुनी है उसकी ... मंथर मंथर..?
जनपथ के रस्ते होती लूट ....
चले आये क्यूँ राजपथ से तुम भी आगे ...
तितलियों की पिचकारी के रंग अभी चुप बैठे हैं कैसे ?
मौसम रंगों का शायद अभी नहीं आया उनका ...या कुछ बारिश की उम्मीद रही होगी ...
चलो चलना ही है अब ..रुकने का क्या काम ..?
मजदूरी का वादा है ..क्या देखनी सुबह या शाम ...--विजयलक्ष्मी


Monday, 21 May 2012

गीली लकड़ी से जल रहे है खुद में हम ...


                                   


                                     
 गीली लकड़ी से जल रहे है खुद में हम 
                                      है तपिश भीतर भीतर उपर से है नम ..
                                      वक्त ए सिला मौत का चल आ ही गया
                                      बददुआ से जिए है, हर जिंदगी में हम .. 
                                      ए जमीं तू ही निगल ले मुझे होश न देना 
                                      होश में आये भी तो फिर से मरेंगे हम ..
                                      आवाज अब मुझे खुद की भी सुनती नहीं 
                                      ये कौन दुनिया? इसमें खोना चाहते है हम .
                                      बहुत हुआ चाँद सितारों का साथ ए आसमा .. 
                                      सूरज को कह जलाए, जलना चाहते हैं हम .
                                      जमींदोज कर दे इस तरह कोई हुआ  न हों ..
                                 
                                      स्पंन्दन का भी
 ,न खुद का पता पाए हम ..---विजयलक्ष्मी 



                                                      

वक्त का चिंतन निरंतर ...

वक्त का चिंतन निरंतर ...
स्वयं का सृजन निरंतर ..
हों गति चाहे मंथर ...
चल निरंतर चल निरंतर ...
वेग संग बहकर के तू 
उड़ा तो चलेगा जिंदगी ..
ये सोच बहाने का हक भी तो नहीं ..
ये कलाकारी है उस सृजन की ..
जिसका श्रीज व्यर्थ नहीं, नहीं कमतर ...
वक्त का चिंतन निरंतर ...
कर्म पथ विस्तृत है अहो या लघुतर द्रष्टिगत हुआ ..
चिर निरंतर प्रयास मधुरम ....
समय दृष्टि को मापता ...
सम्यक सृजन सत्ता चली साम्यता सी वेदना ..
पथ कही किस ओर तुम हों ..?
चल चलूं ,सृजन न अब मापना ...
एक तट ,जल सरस बस ....वक्त धार सा बह
वक्त का चिन्तन निरंतर ?
वक्त का चिंतन निरंतर ....
सौंदर्य औदार्य समय रेख से मिला ...
छोड़ सब उस कला पे ...जो हर कला का देवता ...
जीवन मृत्युं उस कला की दृष्टिगत सी प्रेरणा .---विजयलक्ष्मी

तुम आये मेरे जीवन में ..


तुम आये मेरे जीवन में ..
बदरा सी खुशियाँ बरस गयी मन आँगन में ..
एक अहसास जीवन का मिला आकर जीवन में ..
क्या कहना उन्वानों का,... इह्लामों का .
तुम आये मेरे जीवन में ..
एक अजब सा ख्वाब सजा है जीवन में ...
जाने क्यूँ शहनाई सी सुनती है फिजाओं में ..
गुल खिलने सा अहसास हुआ क्जाओं में ..
तुम आये मेरे जीवन में ...
सुखद सुखद सांसों का आना जाना ..
क्षण क्षण जीवन का मिल जाना ..
खुद का खुद को ही पा जाना ..
अद्वैत सा अहसास हुआ मन में
तुम आये मेरे जीवन में....
सूरज साँझ का भी सहर सी लाया है ..
हर किरण ने कुमुदनी सा खिलाया है ..
क्या कह दूँ क्या खोया है या बस सबकुछ पाया है ..
तुम आये मेरे जीवन में ..
हाँ ,तुम आये मेरे जीवन में ...--विजयलक्ष्मी

Friday, 18 May 2012

सूरज का गलीचा ...

                                                                

                                         
सूरज उतर जमीं पर आ गया जैसे 
                                         धरती पे रंग अबीरी सा हों छाया जैसे ,
                                         या तपिश रंगो सूरत बदल रही है ,अब 
                                         लगा , सूरज संग धरती पिघल रही है जैसे ...


सूरज के गलीचे पर थिरक उठा मन

बजने लगी हों जैसे रुनझुन सरगम 
                                                   ये मौसम क्यूँ आज करवट बदल रहा है ..
                                                           खिल उठा मन का उपवन ..
                                                           लगता है खुश होकर 
                                                           आज अम्बर घर आया मेरे 
                                                           सूरज ने भी फेरा डाला है घर मेरे ..
                                                           कोयल की कुहुक ..छूती है मन को
                                                           तरंग उठी मन में कितनी ..
                                                           झूमझूम धरती अब नाचे ..
                                                           अम्बर प्रेम सुधा बरसाए ..--विजयलक्ष्मी


विशेष आभार ........राजीव चतुर्वेदी जी .

Thursday, 17 May 2012

,दिखती विकल दुःख में डूबी सौंदर्य विहीन बंजर सी क्यूँ धरणी,

जलहीन धरा ,रसहीन धरा खुद भी आज तरसती है ,
दिया जहाँ को जिसने सर्वस्व ,लगता है आज तरसती है ,
छीनी छपटी लुटी लुटी सी है ,मानवता को पुकार रही है वो |

निर्झर झरने हरियाली बाना त्याग, यहाँ जैसे वनवासित हुई, 
दिखती त्यक्ता सी श्रृंगार विहीन फिर अर्पण और समर्पण है ,
सूनी सूनी अंखियों से क्यूँ ,लगता अम्बर को निहार रही है वो |

दिखती विकल दुःख में डूबी सौंदर्य विहीन बंजर सी क्यूँ धरणी,
विधवा नारी सम प्रेमविहिना ,भरी भीतर जैसे दर्द और तर्पण है 
खुद अर्धनग्न होकर भी लगता ,मानवता को दुलार रही है वो |

न चैन मिले ,कब रैन ढले ,नैना अपलक पथराई हुई सी ..
न नीर ढले न अम्बर गीला ,जलती भुनती तपती हुई सी ..
फटे ओष्ठ अम्बर चूमें ,जैसे खुद में खुद को मार रही है वो |

है भरी वेदना अंतर्मन में ,धरती कुछ ऐसी दिखती है ..
वक्त का दर्पण उचक उचक ,मन से थकित चकित सी है दिखती 
रखती हिसाब लम्हे लम्हे का ,हर पल को कैसे गुजर रही है वो |

वक्त आरहा है तपती ही जाती है , दिन दिन आग उगलती क्यूँ है 
मौसम ,तापमान ,प्राक्रतिक नैसर्गिकता को घोट रही सी क्यूँ है 
ह्रदयहीन मानव की अकर्मण्यता को देख ,जैसे खुद को मार रही वो |

अब चीखेगी फिर ,बोल् चुकी पहले भी करती रही आगाह मनुष्य को 
ममत्व का क्या हिसाब चाहिए ? ,सन्तान का ध्यान दुलार चाहिए ,
अरे सम्भल ,समझ क्यूँ रंग बदल , मानवता को अब उजाड रही वो |--विजयलक्ष्मी