Tuesday, 8 August 2017

" रक्षाबंधन के नाम पर सेक्युलर घोटाला "

रक्षाबंधन के नाम पर सेक्युलर घोटाला
डॉ विवेक आर्य
बचपन में हमें अपने पाठयक्रम में पढ़ाया जाता रहा है कि रक्षाबंधन के त्योहार पर बहने अपने भाई को राखी बांध कर उनकी लम्बी आयु की कामना करती है। रक्षा बंधन का सबसे प्रचलित उदहारण चित्तोड़ की रानी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूँ का दिया जाता है। कहा जाता है कि जब गुजरात के शासक बहादुर शाह ने चित्तोड़ पर हमला किया तब चित्तोड़ की रानी कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूँ को पत्र लिख कर सहायता करने का निवेदन किया। पत्र के साथ रानी ने भाई समझ कर राखी भी भेजी थी। हुमायूँ रानी की रक्षा के लिए आया मगर तब तक देर हो चुकी थी। रानी ने जौहर कर आत्महत्या कर ली थी। इस इतिहास को हिन्दू-मुस्लिम एकता तोर पर पढ़ाया जाता हैं।
अब सेक्युलर घोटाला पढ़िए
हमारे देश का इतिहास सेक्युलर इतिहासकारों ने लिखा है। भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अब्दुल कलाम थे। जिन्हें साम्यवादी विचारधारा के नेहरू ने सख्त हिदायत देकर यह कहा था कि जो भी इतिहास पाठयक्रम में शामिल किया जाये। उस इतिहास में यह न पढ़ाया जाये कि मुस्लिम हमलावरों ने हिन्दू मंदिरों को तोड़ा, हिन्दुओं को जबरन धर्मान्तरित किया, उन पर अनेक अत्याचार किये। मौलाना ने नेहरू की सलाह को मानते हुए न केवल सत्य इतिहास को छुपाया अपितु उसे विकृत भी कर दिया।
रानी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूँ के किस्से के साथ भी यही अत्याचार हुआ। जब रानी को पता चला की बहादुर शाह उस पर हमला करने वाला है तो उसने हुमायूँ को पत्र तो लिखा। मगर हुमायूँ को पत्र लिखे जाने का बहादुर खान को पता चल गया। बहादुर खान ने हुमायूँ को पत्र लिख कर इस्लाम की दुहाई दी और एक काफिर की सहायता करने से रोका।
मिरात-ए-सिकंदरी में गुजरात विषय से पृष्ठ संख्या 382 पर लिखा मिलता है-
सुल्तान के पत्र का हुमायूँ पर बुरा प्रभाव हुआ। वह आगरे से चित्तोड़ के लिए निकल गया था। अभी वह गवालियर ही पहुंचा था। उसे विचार आया, "सुलतान चित्तोड़ पर हमला करने जा रहा है। अगर मैंने चित्तोड़ की मदद की तो मैं एक प्रकार से एक काफिर की मदद करूँगा। इस्लाम के अनुसार काफिर की मदद करना हराम है। इसलिए देरी करना सबसे सही रहेगा। " यह विचार कर हुमायूँ गवालियर में ही रुक गया और आगे नहीं सरका।
इधर बहादुर शाह ने जब चित्तोड़ को घेर लिया। रानी ने पूरी वीरता से उसका सामना किया। हुमायूँ का कोई नामोनिशान नहीं था। अंत में जौहर करने का फैसला हुआ। किले के दरवाजे खोल दिए गए। केसरिया बाना पहनकर पुरुष युद्ध के लिए उतर गए। पीछे से राजपूत औरतें जौहर की आग में कूद गई। रानी कर्णावती 13000 स्त्रियों के साथ जौहर में कूद गई। 3000 छोटे बच्चों को कुँए और खाई में फेंक दिया गया। ताकि वे मुसलमानों के हाथ न लगे। कुल मिलकर 32000 निर्दोष लोगों को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा।
बहादुर शाह किले में लूटपाट कर वापिस चला गया। हुमायूँ चित्तोड़ आया। मगर पुरे एक वर्ष के बाद आया।परन्तु किसलिए आया? अपने वार्षिक लगान को इकठ्ठा करने आया। ध्यान दीजिये यही हुमायूँ जब शेरशाह सूरी के डर से रेगिस्तान की धूल छानता फिर रहा था। तब उमरकोट सिंध के हिन्दू राजपूत राणा ने हुमायूँ को आश्रय दिया था। यही उमरकोट में अकबर का जन्म हुआ था। एक काफ़िर का आश्रय लेते हुमायूँ को कभी इस्लाम याद नहीं आया। और धिक्कार है ऐसे राणा पर जिसने अपने हिन्दू राजपूत रियासत चित्तोड़ से दगा करने वाले हुमायूँ को आश्रय दिया। अगर हुमायूँ यही रेगिस्तान में मर जाता। तो भारत से मुग़लों का अंत तभी हो जाता। न आगे चलकर अकबर से लेकर औरंगज़ेब के अत्याचार हिन्दुओं को सहने पड़ते।
इरफ़ान हबीब, रोमिला थापर सरीखे इतिहासकारों ने इतिहास का केवल विकृतिकरण ही नहीं किया अपितु उसका पूरा बलात्कार ही कर दिया। हुमायूँ द्वारा इस्लाम के नाम पर की गई दगाबाजी को हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे और रक्षाबंधन का नाम दे दिया। हमारे पाठयक्रम में पढ़ा पढ़ा कर हिन्दू बच्चों को इतना भ्रमित किया गया कि उन्हें कभी सत्य का ज्ञान ही न हो। इसीलिए आज हिन्दुओं के बच्चे दिल्ली में हुमायूँ के मकबरे के दर्शन करने जाते हैं। जहाँ पर गाइड उन्हें हुमायूँ को हिन्दूमुस्लिम भाईचारे के प्रतीक के रूप में बताते हैं।
..ये कौन से सेकुलरिज्म में है तथ्यों को छिपाया जाय ?

Thursday, 3 August 2017

" मुहं अँधेरे उठती है "

" मुहं अँधेरे उठती है 
ठंडे चूल्हे तकते है राह 
लीपती है जिन्हें अपने चेहरे से भी पहले 
चढ़ती है पतीली अलसुबह 
सूरज भी करता है झुककर नमन 
लगता है जैसे सूरज को जगाती है चूल्हे की गर्मी से
बिन ब्रश के दातुन नीम की
उम्र से पहले उम्र दराज सी
मन से कोमल मतवारी सी
घर और खेत को मांजती है कंधे से कंधा मिलाकर
ठंडी छाज और गर्म दूध
चलता है रसोड़े में जिनके बसी रोटी के संग
समझ और ईमानदारी की महीन छलनी
छनकती है सास के पैरो पर मालिश करते हाथों में
उनकी घुमक्कड़ी रहती है घर घेर और खेत तक
मैका भी याद आता है सावन की ठंडी सी फुहार के गीतों में
देती है मीठे सिटने
तिसपर
कभी बुआई कभी कटाई
अबके बरस ननद का गौना
परके बरस ब्याही थी चौमासे में
अभी ब्याई गैया की बछिया चार दिन की ही हुई
जेठ की दुपहरी नहीं तपाती उन्हें
हाँ वही तथाकथित जाहिल सी दिखती औरते
लम्बा सा घुंघट और निश्छल सी मुस्कुराहट
नहीं लेती पति का नाम आज भी
सीता की तरह तिरछी नजर बताती है जीवनसाथी का अर्थ
नहीं समझ सकोगी कभी ..."तुम "
उस लज्जा की चादर को ..
जो बंधी है पिता के द्वारा बांधे गये इज्जत के खूंटे से
तुम जाम छलकाओ और चिरौरी करो
नारी विमर्श पर लम्बी लम्बी बाते करो
व्याखान लिखो पुरूस्कार पाओ
और करो गलबहियाँ नाच ,,,
चखना की तरह महिला के नाम पर कलंकित करती हुई तुम्हारी सोच
नहीं छू पाएगी पावनता की वो पराकाष्ठा
जाहिल शब्द का वास्तविक अर्थ तुम नहीं समझ सकोगी कभी ||
" ----- विजयलक्ष्मी

Tuesday, 18 July 2017

" बर्बर हैं वो ,,"

बर्बर हैं वो ,,
ईमान से ,नाम से 
सिर्फ दूसरों के लिए 
अपने लिए 
जिन्दगी का लुत्फ़ चाहिए 
लेकिन बर्बरता ..
ये गुण या अवगुण
किन्तु रोप दिया है
मन की जमीन पर
किसी बीज की तरह
असर लहू में घुल गया है शायद
बेमानी है
चैन औ शांति
जैसे खरपतवार की तरह
निकल दी छाँट-छांट कर
ज्ञान के नाम पर
बंदूक की गोली
बम फेंकते हैं
पत्थर भी बम बनाकर फेकते हैं
बर्बरता दिखाते लोगो की तरफदारी
ये कौन सा बीज है
क्या नफरत का
या एक धर्म सिद्धांत का
कठिन है
या मुश्किल
सिर्फ दिखाई दे रही है
उन्हें हुकुम है या
मानसिक विकलांग है वो
बर्बर है वो
ईमान से ,नाम से
सिर्फ दूसरों के लिए
अपने लिए भूख
देह की
पेट की
तन की
मन की
सत्ता की
कैसी निर्मम भूख है
या ..
या ...
सभ्यता से उलटी जिन्दगी
फिर से
वही प्रारूप
अँधेरे
हजारों बरस पुराणी तस्वीर
जहां ..
हवस होगी
पशुता होगी
या होगी ..
सदी की सड़ी गली मान्यताएं
सीमाहीन परिस्थति
पतन ही पतन है
सभ्यता को दफनाया जा रहा है
मानुष देह में
बर्बरता ,शोषण ,गुलामी ,अन्धविश्वास
और ...और ..
होगा अनहद दर्द का सैलाब
जहां पशुता जिंदाबाद ||
---- विजयलक्ष्मी

Monday, 17 July 2017

राष्ट्रवादी देशभक्ति



राष्ट्रवादी देशभक्ति ,जो भारत को अक्षुण्य बनाती है । उसके प्राचीन गौरव को लेकर आगे बढ़ती है । भारत के हजारों वर्ष के सौष्ठव का गठन करती है । भारतीय इतिहास , संस्कार संस्कृति को अक्षुण्ण रखती है। 
आइए एक और एक ग्यारह हो जाएं ।। जयहिन्द ।।जय भारत ।।








है जिन्दा कलम. जिन्हें देश प्रेम ही आता है ,,
प्रेम के रंग में डूबा प्रेयस सा भारत ही भाता है ||
कभी कटार कभी तलवार का करते श्रृंगार 
भाषाई शब्दों से भी बम-बौछार बनाना भाता है ||
----- विजयलक्ष्मी





धुआँ धुआँ सी फिजा,,रौशनी क्यूँ हुई कम ..
दौर ए नफरत न बढ़ा ए जिन्दगी रख भ्रम ||
यूँ नामालूम है साँसे ,,रखे भी क्या खबर 
मुस्कुरा भी ले घड़ी भर,,न कर आँख नम ||
खिलने दे इन्द्रधनुष,,घड़ी भर का ही सही 
रोशन सितारे बहुत होंगे ,, जिन्दगी है कम ||
---- विजयलक्ष्मी



डूबे या तिरे कश्तियाँ ,किनारे या मझधारे 
जानती हैं ,, जिंदगी तो वही बीच जलधारे।। -- विजयलक्ष्मी

Friday, 14 July 2017

" जुगनू बन जलने की चाहत,"

कभी मेरी नजर से भी देख ए चाँद मेरे चाँद को ,,
सोचती हूँ मगर न लग जाए नजर मेरे चाँद को ||
--- विजयलक्ष्मी




खामोशी में सुनो आहत दिल की आहट ,,
बयाँबाजी शब्दों की छोटी लगने लगेगी ||
--- विजयलक्ष्मी


हम चाँद या सूरज हैं नहीं ,,सितारे जैसी औकात नहीं ,,
जुगनू बन जलने की चाहत, जा बैठे जहां प्रकाश नहीं || --- विजयलक्ष्मी